Cambridge IGCSE Hindi as a Second Language 0549 — 2022 Feb/March Paper 1 · Variant 0

0549/10/F/M/22 · 60 marks · ≈68 min

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Question paper16 pages

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This document has 16 pages. Any blank pages are indicated. KI 303804/2 © UCLES 2022 [Turn over * 3 0 3 6 8 4 0 0 0 5 * HINDI AS A SECOND LANGUAGE 0549/01 Paper 1 Reading and Writing February/March 2022 2 hours You must answer on the question paper. No additional materials are needed. INSTRUCTIONS ● Answer all questions. ● Use a black or dark blue pen. ● Write your name, centre number and candidate number in the boxes at the top of the page. ● Write your answer to each question in the space provided. ● Do not use an erasable pen or correction fluid. ● Do not write on any bar codes. ● Dictionaries are not allowed. INFORMATION ● The total mark for this paper is 60. ● The number of marks for each question or part question is shown in brackets [ ]. Cambridge IGCSE™

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2 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 अभ्यास 1: प्रश्न 1-6 ‘ऐलो वेरया’ आलेख को ध्या्नपूव्वक पढ़िए और पूछे गए प्रश्नों के उत् तर दीजिए। ऐलो वेरा, जिसे कवारगंदल और गवारपाठा के नाम से भी िाना िाता है, एक औषधीय पौधे के रूप में ववखयात है। संसककृत में इसका नाम घकृतकुमारी है। ऋगवेद में घकृतकुमारी का उललेख एक रहसयमय पौधे के रूप में है। इसका उपयोग सौंदय्य-प्रसाधन-सामग्ी के रूप में ककया िाता है। इसकी उतप जत त समभवत: उत तरी अफ्ीका में हुई। यह पौधा मधय-पूव्य के देशों की बंिर धरती तथा भारत में रािसथान, आंध्रप्रदेश, तममलनाडु, महाराष्ट्र और गुिरात में भी पाया िाता है। घरों के अंदर ऐलो वेरा का पौधा गमले में सिावट के तौर पर लगाया िाता है। सभी सभयताओं ने इसको एक औषधीय पौधे के रूप में मानयता दी है और पहली शताबदी ईसवी से औषधध के रूप में इसका प्रयोग होता आ रहा है। आयुववेद के प्राचीन ग्ंथों में पेट की बीमाररयों में इसके लाभकारी प्रभाव का उललेख है। नयू टेसटामेंट में ऐलो का उललेख ममलता है, लेककन यह सपष्ट नहीं है कक नयू टेसटामेंट में वर््यत ऐलो और ऐलो वेरा एक ही हैं। यूनान के प्राचीन दसतावेज़ में ऐलो वेरा के औषधीय गु्ों का ववसतकृत व््यन करते हुए उसे ‘अमरतव प्रदायक पौधा’ कहा गया है। ‘ऐलो’ अरबी भाषा के शबद ‘एलोह्’ से मलया गया है जिसका अथ्य चमकदार कड़वा पदाथ्य है िो उसके कसैले/ कड़वे सवाद का पररचायक है। ‘वेरा’ का अथ्य ववशुƨ या प्रामार्क है। ऐलो वेरा का पौधा बबना तने का या बहुत ही छोटे तने का गूदेदार और रसीला पौधा होता है जिसकी लमबाई 60-100 सेंटीमीटर तक होती है। इसका फैलाव नीचे से ननकलती शाखाओं दवारा होता है। इसकी प जत तयाँ लमबी, मोटी और मांसल तथा रंग हरा, हरा-सलेटी होता है। कुछ प्रिानतयों की प जत तयों की ऊपरी और ननचली सतह पर सफेद धचजत तयाँ होती हैं। कटावदार ककनारों वाली प जत तयों के दोनों ओर सफेद रंग के छोटे-छोटे काँटों की पंजकत होती है। गममी के मौसम में एक लमबी डणडी के ऊपर पीले रंग के फूल रखलते हैं। ऐलो वेरा के पौधे की सूखी और मरुसथलीय ज़मीन पर पनपने वाली ववशेषता ने वनसपनतज्ों का धयान आकवष्यत ककया है। उनका सोचना है कक पौधे की इस ववशेषता का अधययन िलवायु पररवत्यन और भूमणडलीय ऊष्मीकर् में कम पानी से खेती करने के नये उपाय खोिने में सहायक हो सकता है। इसमलए वे शोध कर रहे हैं कक ऐलो वेरा के पत तो के भीतर के गूदे में पानी ककस तरह से संधचत रहता है। ऐलो वेरा के बारे में दावे ककए िाते हैं कक उससे पाचनकरिया बेहतर होती है, मधुमेह पर ननयंत्र् होता है, हानन-कारक कोलेसट्ररॉल कम होता है, प्रनतरक्ा-प्र्ाली सुदृढ़ होती है और सूिन व दद्य से राहत ममलती है। ककंतु इन प्रभावों की पुजष्ट के मलए बहुत कम वैज्ाननक साक्य उपलबध हैं।

Question paper, page 3

3 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over 1 प्राचीन काल में ऐलो वेरा का उपयोग ककस रूप में ककया िाता था? … [1] 2 ऋगवेद के अनुसार यह ककस प्रकार का पौधा है? … [1] 3 ‘ऐलो’ शबद ककस भाषा से ननकला है और खाने में वह कैसा लगता है? … … [2] 4 ऐलो वेरा उगाने के मलए कैसा िलवायु होना चाहहए? … … [2] 5 वैज्ाननकों को ऐलो वेरा में कयों रुधच है? … [1] 6 ऐलो वेरा को जितना गु्कारी बताया िाता है, लेखक के अनुसार वह उतना गु्कारी कयों नहीं है? … [1] [पू्ाांक 8]

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4 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 अभ्यास 2: प्रश्न 7-15 ‘स्न् 2050 में हम क्या खयाएँगे?’ के बयारे में छपे इस लेख को ध्या्न से पिें। प्रश्न 7 से 15 कया उत् तर दे्ने के ललए उ्नके ्नीचे ढ़दए गए अ्नुचछेदों (A से D) में से सही अ्नुचछेद चु्न कर उसके सयाम्ने के कोष्ठक में सही कया न्नशया्न लगयाएँ। अ्नुचछेदों को एक से अधिक बयार चु्नया िया सकतया है। A वपछले सपताह आपने ककतने प्रकार की वनसपनतयों का भोिन ककया था? दैननक आहार में वनसपनत से ममलने वाली पचास प्रनतशत से अधधक कैलरी केवल तीन अनाि - चावल, गेहूँ और मकई से ममलती है। उचच तापमान, अननयममत वषा्य, बाढ़, सूखा, अकाल, चरिवात आहद में बढ़ोतरी ककृवषिैव ववववधता के मलए संकट पैदा कर रहे हैं। वपछले सौ वषषों में पकृथवी का औसत तापमान 1.5 डडग्ी सैजलसयस बढ़ गया है। इसका मुखय कार् मनुष्य दवारा ननमम्यत ग्ीन हाउस गैसे हैं। संसार के तापमान में होने वाली वकृजƨ से मौसम और बाररश में ख़तरनाक उतार-चढ़ाव आ रहे हैं। इसका प्रतयक् प्रभाव ककृवष उपि में पररवत्यन के रूप में देखा िा रहा है। भूमणडलीय ऊष्मीकर् के कार् कीटों की बढ़ती हुई संखया और खेती योगय भूमम की कमी के परर्ामसवरूप केवल इन तीन फ़सलों पर ननभ्यरता भववष्य में बढ़ती हुई िनसंखया के भोिन की ज़रूरतों को पूरा करने के मलए एक बहुत बड़ी चुनौती बन सकती है। सबसे अधधक समसया उन ववकासशील देशों के सामने आएगी िो ककृवष पर ननभ्यर करते हैं। B मनुष्य ववववध प्रकार की वनसपनतयों से प्रापय भोिन का उपयोग करने में माहहर है। यह िानना कहठन है कक िब से मनुष्य ने खेती करना सीखा तब से अब तक हमारे आहार में ककतनी ववववधता आई है। पर यह सपष्ट है कक बीसवीं शताबदी के मधय से हररत रिांनत के बाद पररवत्यन की गनत में तीव्रता आई है। ननरंतर बढ़ती हुई िनसंखया का पेट भरने के मलए सीममत प्रिानत के अनाि के उतपाद की मात्रा में बढ़ोतरी करने पर धयान केंहरित हुआ है। गेहूँ और चावल िैसे पररधचत अनाि सव्यवयापी हो गए, पर जवार, बािरा िैसे अनाि और कसावा तथा अनय प्रिानतयों के कंद के उपयोग में अपेक्ाककृत धगरावट आई। कया हम अपनी वत्यमान फ़सल को िलवायु पररवत्यन के अनुकूल बना सकते हैं? यहद यह संभव नहीं तो हमें उसके अनुकूल नई फ़सलों को ववकमसत करना होगा। आवशयकता है ऐसी प्रिानतयों की फ़सलों को ववकमसत करने की जिनमें अनुपिाऊ धरती में पनपने की क्मता हो और िो बाढ़ और सूखे िैसे चरम िलवायु से अप्रभाववत रह सकें। C इस शताबदी में वनसपनत की ककन प्रिानतयों की खादय पदाथ्य में ग्ना की िाए यह िलवायु पररवत्यन पर ननभ्यर होगा। वैज्ाननकों के अनुसार ननकट भववष्य में तापमान की वकृजƨ, अनतवकृजष्ट और अनावकृजष्ट की ननरंतरता, पराबैंगनी प्रकाश और काब्यनडाइ ऑकसाइड की बढ़ती मात्रा से पया्यवर् प्रदूवषत होगा। इसके साथ ही बबिली के उपयोग को कम करना आवशयक होगा। खेती में उपि बढ़ाने के मलए प्रयुकत उव्यरक रसायन और कीटनाशक औषधधयाँ केवल वायुमंडल को ही दूवषत नहीं करतीं। उनके उपयोग से पैदावार में बढ़ोतरी तो होती है, पर सवासथय पर उनके हाननकारक प्रभाव प्रतयक् रूप से देखे िा सकते हैं। उससे बचाव के मलए उनके प्रयोग पर पाबंदी लगाकर की िानी वाली ऑगवेननक खेती आधथ्यक दृजष्ट से एक सीमा तक ही सफल हो सकती है। D ऐसे में भववष्य के उपयुकत आहार की खोि में अफ़्ीका की लोबबया और लैबलैब िैसी देशि दालें महतवपू््य हो सकती हैं कयोंकक वे बंिर धरती और गम्य आबोहवा में फलती हैं। वैज्ाननकों दवारा की गई नई फ़सल की खोि का एक उदाहर् ईधथयोवपया में पैदा होने वाली केले की एक प्रिानत है। वहाँ के दो करोड़ लोगों का मुखय आहार एनसेट नाम से पुकारी िाने वाली केले की एक प्रिानत का यह दस मीटर लमबा पेड़ है। वे उसके केले िैसे फल को खाने के अनतररकत उसके तने और धरती के नीचे दबे कंद को ख़मीरा करके उसकी रोटी बनाकर खाते हैं। इस तरह उसका कोई भी हहससा वयथ्य नहीं िाता। एनसेट का पेड़ बंिर ज़मीन और शुष्क िलवायु में कई वषषों तक हटकता है जिससे उसकी खेती करने वाले समुदाय उस पर ननजशचंतता से ननभ्यर कर सकते हैं। यह तय है कक यहद हम अपनी वत्यमान मानमसकता में पररवत्यन नहीं ला सके तो समभवत: ववशव की ननरंतर बढ़ती हुई िनसंखया की ज़रूरतों को पूरा करना मुजशकल ही नहीं असमभव होगा।

Question paper, page 5

5 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over ्नीचे ढ़दए गए वकतव्ों (7–15) को पढ़िए तथया कोष्ठक में सही कया न्नशया्न लगया कर बतयाइए कक कौ्न सया अ्नुचछेद (A–D) ककस वकतव् से समबबंधित है। उदयाहरण: चावल, गेहूँ और मकई हमारे मुखय आहार हैं। A  B C D 7 िलवायु में बदलाव के अनुसार अपनी सोच को बदलना ज़रूरी है। A B C D [1] 8 िलवायु पररवत्यन से सबसे ज़यादा नुकसान ककसान का होता है। A B C D [1] 9 आवशयकता है ऐसी फ़सल उगाने की िो िलवायु की अननयममतता से प्रभाववत न हो। A B C D [1] 10 आवशयकता है पारमपररक अनाि की कमी की पूनत्य के मलए ककसी और नई फ़सल की। A B C D [1] 11 खादय पदाथषों में समय-समय पर बदलाव होता आ रहा है। A B C D [1] 12 रासायननक खाद और कीटनाशक औषधध पया्यवर् को दूवषत करती हैं। A B C D [1] 13 वत्यमान ककृवष उतपाद बढ़ती हुई ज़रूरतों को पूरा करने के मलए पया्यपत नहीं होंगे। A B C D [1]

Question paper, page 6

6 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 14 वायुमणडल का तापमान बढ़ने से अननोतपादन में कमी आई है। A B C D [1] 15 रसायनहीन खेती आधथ्यक दृजष्ट से िन-साधार् की सामथय्य से बाहर है। A B C D [1] [पू्ाांक 9]

Question paper, page 7

7 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over BLANK PAGE

Question paper, page 8

8 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 अभ्यास 3: प्रश्न 16-19 ‘पररच्या्व’ के बयारे में न्नम्नललखखत आलेख को ध्या्नपूव्वक पढ़िए। रोगी की सेवा-सुश्ूषा करने को पररचया्य कहते हैं। पररचया्य का इनतहास प्राचीन काल में वेदों से आरमभ होता है िब समाि में रुग् वयजकत की सेवा-सुश्ूषा का काम बहुत आदर की दृजष्ट से देखा िाता था। लगभग 100 ईसवी पूव्य चरक ने उपचाररका के मलए बुदधधमान, दयावान, रोगी की सब प्रकार से सेवा करने में दक् तथा, धैय्यवान होना आवशयक माना। 460 ईसवी पूव्य औषध-शासत्र के वपता माने िाने वाले प्रमसƨ यूनानी धचककतसक हहपपरॉरिेटीज़ ने रोगी की ठीक प्रकार से देखभाल की ववधध की िानकारी दी थी। प्राचीन ईसाई चच्य संघ के समय जसत्रयाँ अपना घर-बार छोड़कर रोधगयों तथा संकटग्सत लोगों की सेवा-सुश्ूषा करने िाया करती थीं। माना िाता है कक आधुननक पररचया्य की नींव फलोरेंस नाइहटंगेल ने डाली। उनका िनम एक समपनन पररवार में हुआ था। वैभव से नघरे अकम्यणय िीवन से असंतुष्ट होकर उनहोंने पररचया्य का प्रमशक्् मलया और लंदन में एक पररचया्य-भवन सथावपत ककया। 1845 ईसवी में बरिटेन के युƨ-सधचव के कहने पर वे 34 वष्य की आयु में 38 नसषों के दल के साथ रिाइममया की लड़ाई में घायल और बीमार मसपाहहयों की सेवा-सुश्ूषा करने गईं। उनहोंने वहाँ िाकर हाथ धोने आहद सवासथय ववज्ान के मसƨांतों को असपताल के प्रबंध में लागू ककया। सैननक अधधकाररयों ने प्रारमभ में उनका ज़ोरदार ववरोध ककया कयोंकक उनको लगा कक ममस नाइहटंगेल सैननक वयवसथा के अनुशासन को भंग कर देंगी। पर उनहोंने अपने मसƨांत पर अडडग रह कर कहठनाइयों का दृढ़तापूव्यक सामना ककया। उनके प्रबंध के परर्ामसवरूप बैरक के असपतालों में मकृतयुसंखया 42 प्रनतशत से घटकर 2 प्रनतशत रह गई। उनकी कम्यठता और उपलजबध उस युग की एक आशचय्यिनक कहानी बन गई। 1856 में युदध समापत होने पर िब वे वापस लौटने वाली थीं, बरिहटश सरकार ने उनको लाने के मलए एक युƨपोत की वयवसथा की और लंदन में उनके रािसी सवागत की तैयारी की। ककंतु वे एक फ्ांसीसी िहाि से चुपचाप इंगलैणड आकर अपने घर चली गईं। उनके आने का समाचार उनके वापस पहुँचने के बाद ममला। उनके प्रयास से सन 1860 में लंदन में नसषों के प्रमशक्् के मलए एक मशक्ालय बना िो इस प्रकार का प्रथम मशक्ालय था। फलोरेंस नाइहटंगेल जिस समय रिाइममया में घायल मसपाहहयों की सेवा-सुश्ूषा में लगी हुई थीं उसी दौरान िमैइका मूल की महहला डरॉकटर नाम से प्रमसदध एक कैरेबीअन महहला सुदूर ककंगसटन में अपने सकौहटश पनत के साथ एक बोडडांग हाउस चला रही थीं। गनने के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों का पारमपररक िड़ी बूहटयों से इलाि करते हुए उनको गम्य िलवायु में होने वाली बीमाररयों की अचछी िानकारी हो गई थी। उनकी बेटी मेरी सीकोल ने अपनी माँ की देखरेख में िड़ी-बूहटयों से उपचार करने की ववधध सीखी और अपनी गुडडडयों से शुरू करके पालतू िानवरों तक का इलाज़ करने के बाद अपनी माँ का हाथ बटाना शुरू ककया। उनके वपता सेना में लेजफटनेंट थे। मेरी सीकोल को सैननक असपताल में डरॉकटरों की उपचार पƨनत देखने का और सैननकों में हैज़े का प्रकोप बढ़ने पर रोधगयों का उपचार करने का अवसर ममला। सन 1851 में वे अपने भाई से ममलने पनामा गईं। शहर में हैज़ा फैला हुआ था। मेरी ने लगन और सफलता पूव्यक बीमारों का इलाि ककया। शीघ्र ही उनकी खयानत दूर-दूर तक फैलने लगी और उसके साथ ही बढ़ती गई रोधगयों की संखया।

Question paper, page 9

9 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over िब फलोरेंस नाइहटंगेल नसषों का एक दल बनाकर रिाइममया िा रही थीं, मेरी सीकोल ने उस दल में शाममल होने के मलए आवेदन हदया, पर उनका आवेदन बबना कार् बताए रƧ कर हदया गया। अपनी असफलता से हताश होने के बिाय मेरी सीकोल ने सन 1855 में सवतंत्र सवयंसेववका के रूप में रिाइममया िाकर एक भोिनालय खोला जिसमें मुफ़त भोिन और पेय बाँटने के साथ वे घायल सैननकों की पररचया्य करने लगीं। घायल सैननक उनहें ‘माँ सीकोल’ पुकारते थे। उनके इरादों को संदेह की दृजष्ट से देखने वाले अधधकारी भी उनके अथक पररश्म, लगन और उदारता से प्रभाववत थे। मेरी सीकोल ने अपनी आतमकथा में फलोरेंस नाइहटंगेल से ममलकर उनके दल में सजमममलत होने का अनुरोध करने के बारे में मलखा, पर दूसरी बार भी उनहें असफलता ही ममली। मेरी ने अपनी आतमकथा में मलखा कक समभवत: इसके पीछे उनका ममश्िातीय होना रहा होगा। ततकालीन इनतहासकारों ने उपचाररका के रूप में मेरी सीकोल के योगदान को नकारते हुए मलखा कक वे चाय और लेमोनेड के मुफ़त ववतर् करने के मलए िानी िाती थीं। ककंतु 21वीं शताबदी में उनके नाम से बनी ववशवववदयालयों की इमारतें और असपतालों के वाड्य उनकी ववरासत के समारक हैं। आि मेरी सीकोल का नाम फलोरेंस नाइहटंगेल के साथ मलया िाता है। आधुननक पररचया्य का इनतहास मेरी सीकोल के उललेख के बबना अधूरा रहेगा।

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10 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 अभ्यास 3: प्रश्न 16-19 ‘पररच्या्व’ आलेख के आियार पर ्नीचे ढ़दए गए प्रत््ेक शीर्वक (16-19) के अबंतग्वत सबंक्षिपत ्नोट ललखें। 8 [पू्ाांक 9] अभ्यास 4 में आप आलेख और अप्ने ्नोटस के आियार पर ‘पररच्या्व’ शीर्वक लेख कया सयारयाबंश ललखेंगे। 16 प्राचीन ग्ंथों में पररचया्य का इनतहास • … • … [2] 17 आधुननक पररचया्य के दो प्रवत्यक • … • … [2] 18 उपचाररका के तीन मुखय गु् • … • … • … [3] 19 मेरी सीकोल के महतव को अनदेखा करने के दो समभाववत कार् • … • … [2]

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11 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over अभ्यास 4: प्रश्न 20 अभयास 3 के आलेख ‘पररचया्य’ में उपचार की प्राचीन भारतीय परमपरा और आधुननक धचककतसा के योगदान में फलोरेंस नाइहटंगेल और मेरी सीकोल का व््यन है। अभयास 3 के आलेख और अपने बनाए नोटस के आधार पर मेरी सीकोल के योगदान के ववषय में ततकालीन इनतहासकारों की धार्ा के समभाववत कार्ों सहहत आलेख का सारांश मलखें। आपका सारांश अधधकतम 100 शबदों में होना चाहहए। आप यथासंभव अप्ने शबदों में मलखें। आपको अबंतव्वसतु के ललए अधधकतम 4 अंक और सटीक एवबं सबंक्षिपत भयारया-शैली के ललए अधधकतम 6 अंक हदए िाएंगे।

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12 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … [10] [पू्ाांक 10]

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13 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over अभ्यास 5: प्रश्न 21 आपने हाल में एक कफ़लम देखी िो आपको बहुत पसंद आई। कफ़लम की समीक्ा मलरखए। समीक्ा में ननमनमलरखत बातें सजमममलत होनी चाहहए: 1 कफ़लम की कथावसतु 2 उसका सबसे रोचक भाग 3 ककस उम्र के दश्यकों के मलए उपयुकत है और कयों? आपकी समीषिया लगभग 120 शबदों में हो्नी चयाढ़हए। आपको 3 अंक अबंतव्वसतु के ललए और 5 अंक सटीक भयारया एवबं शैली के मलए हदए िाएँगे।

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14 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … [8] [पू्ाांक 8]

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15 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 [Turn over अभ्यास 6: प्रश्न 22 लशषिया-सबंसथयाओबं में मोबयाइल फो्न पर प्रनतबबंि हो्नया चयाढ़हए। आप कहाँ तक इस मत से सहमत हैं? अपने ववचारों को समझाते हुए सकूल पबत्रका के मलए अपना लेख लगभग 200 शबदों में मलरखए। आपका लेख ववषय से समबंधधत िानकारी पर केजनरित होना चाहहए। ऊपर दी गई ढ़टपपखण्याँ आपके लेख्न के ललए ढ़दशया प्रदया्न कर सकती हैं। इ्नके मयाध्म से आप अप्ने ववचयारों को ववसतयार दीजिए। ललखखत प्रसतुनत पर अबंत्वसतु के ललए 8 अबंक तक और सटीक भयारया के ललए भी 8 अबंक तक ढ़दए ियाएँगे। … … … … … … … … … … … … … … … … … … मोबाइल फ़ोन कक्ा में बाधक ववषय संबंधी िानकारी देने में सहायक

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16 0549/01/F/M/22 © UCLES 2022 … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … … [16] [पू्ाांक 16] Permission to reproduce items where third-party owned material protected by copyright is included has been sought and cleared where possible. Every reasonable effort has been made by the publisher (UCLES) to trace copyright holders, but if any items requiring clearance have unwittingly been included, the publisher will be pleased to make amends at the earliest possible opportunity. To avoid the issue of disclosure of answer-related information to candidates, all copyright acknowledgements are reproduced online in the Cambridge Assessment International Education Copyright Acknowledgements Booklet. This is produced for each series of examinations and is freely available to download at www.cambridgeinternational.org after the live examination series. Cambridge Assessment International Education is part of Cambridge Assessment. Cambridge Assessment is the brand name of the University of Cambridge Local Examinations Syndicate (UCLES), which is a department of the University of Cambridge.

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A37/60
B31/60
C25/60
D21/60
E17/60
F12/60
G7/60